कविता शीर्षक : "बचपन के खेल"
कविता के तारीख : 19/Mar/09 02:14:54 PM

याद आवेला बीतल बचपन के सब खेल.
अभी बहूत कुछ बाकी बा ई दुनिया में भेल.

रोअत रोअत खात रहे कहत रहे खेले के बा खेल.
हरदम जाके खेले गाओ में अपना अपन खेल.

खेलत खेलत में बबुवा के अपने टूटगेल टांग.
माई, बाप, रोअत कह के हाय हाय हमर जान.

तू का कैला अब हमनी के सहारा हाँथ से गेल.
हरदम कहत रही कहिना ना जा खेले कोई खेल.

तू ना मानला होगैल सब के १ साल के जेल.
तू नाजैत खेले त हमनी के ना होइत जेल.

अब का करी केहुना हमनी के सहारा भेल.
बाद में जाके हमनी के ही जीत भेल.

छुट गैली सब मुसीबत से अब ना जाएब कबो जेल.
हमर बात मान तू कबो ना खेले जैह अइसन खेल.

मनिर आलम
ठेगाना : इनर्वामाल, हरनहिया, बारा, नेपाल.
हाल में अभी : दोहा कातार
G-Mail: manirlove@gmail.com

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Tags: ALAM, MANIR

Comment

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Comment by Shalu Sharma on June 30, 2009 at 12:15am
Mast hai. Bahut achha.
Comment by मनिर आलम MANIR ALAM on June 29, 2009 at 8:38pm
Bahut bahut sukriya noor jee comments khatir lagal rahi,.........!
Comment by Noor Alam Baadshah on June 29, 2009 at 2:16pm
bahoot bahoot badhiya rachna manir jee. dhandyabad for nice kavita

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