Nitish Kumar Fan Club

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If you think Nitish Kumar is a great chief minister then join his fan club. This club is dedicated to our beloved chief minister of Bihar. We need you Nitish to show us the way to a more prosperous Bihar.

Location: Patna, Bihar
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Latest Activity: Mar 30

The Best CM - By CNN-IBN & Hindustan Times State of the Nation Poll 2007.
Contact Nitish Kumar: E-Mail: cmbihar-bih@nic.in
Tel: 0612-2223886, 2224784 (O). 2222079 (R).

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soch badlo........

Started by Abdur Rab Dec 11, 2013. 0 Replies

Is Nitish Ji Crossing Limit?

Started by upendra sah. Last reply by RAJKUMAR SINGH Jun 28, 2013. 34 Replies

hey

Started by Yogesh Dwivedi Jul 9, 2012. 0 Replies

Is India's political entity is being orphand?

Started by upendra sah. Last reply by Gaurav Gupta Jun 21, 2012. 1 Reply

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Comment by neeraj singh on July 24, 2010 at 2:50pm
nitis kumar is a very good CM i praud of nitis kumar
Comment by udayveer on July 16, 2010 at 1:43pm
Anil ji sailing 2 boats is not done by any bidy then why nitish ji same is going to happen,but we r waiting for the best do not lose patent
Comment by Rakesh Kumar Singh on July 11, 2010 at 11:27am
I think electricity is the main problem in Bihar. Our government must take some initiative to solve the crisis of electricity in the State.
Comment by Serajuddin Khan on July 6, 2010 at 9:14pm
Please talk on all round develoment and you will not get vote from Muslim by attacking on Nitish so far as welfare of Muslim community is concerned. What you did for 15 years go and ask yourself except goondaism, curruption,more unemployment,poverty and worst that you devided people in the name of caste and religion just for the sake of power. RJD you have lost completely even before election so please don't waste your time on public meeeting and press conferences, better to do some social work and try to get people into confidence for Assembly Election 2014 - 2015.
Comment by Rajesh kumar sinha on July 6, 2010 at 6:50pm
Bihar has gone under remarkable change during last five year i.e in the ruling period of Nitish ji.He is a literate person and he is aware of it that what will go in favor of Bihar.People of Bihar should be proud on him to have a great CM after a long duration.And I hope that if will come in power again.bihar will be no less than any metro city like delhi or banglore.
Comment by ARIF AKHTAR on July 4, 2010 at 3:08am
::::: आम मध्यवर्गीय आदमी :::::
( गंभीर लेख )

आज छोटी-बड़ी हर चीज़ के दाम बढे चले जा रहे हैं ! आम आदमी बढे कई दामों से खुद को असम्बद्ध पाता है ! पर भूल जाता है वह कि हो चुकी हर बात, घटनाक्रम या फैसला उसके जीवन में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष आने वाले परिवर्तनों की जड़ होते हैं ! कैसे कह सकते हैं हम कि जब पैट्रोल के दाम बढ़ते है...ं तो बीस-तीस लाख वाले को फर्क पड़ना चाहिए जो कि सिर्फ पचास-पचपन रुपये का होने ही वज़ह से उसे कोई अंतर नहीं आने वाला ! क्यूँ भूल जाते हैं हम कि वही पैट्रोल रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हर बात को प्रभावित करता है ! चाहे वह वस्तुओं की आवाजाही हो या मनुष्यों की ! असर एक सा ही पड़ना है सब पर ! ज़रा-2 बढ़ते भाव देखे जाएँ तो सभी चीज़ों के बढे भाव जोड़ कर देखो, महीने के आखिर में कुल कितना वज़न नज़र आता है आम आदमी पर !

पहले गरीबों ने ही परेशान होने का ठेका ले रखा था लेकिन आज निम्न-मध्य वर्ग तक स्थानांतरित हो चुकी है यह परेशानी ! गरीब तो कुछ भी काम करने का आदि है, अक्सर भीख भी मांग लिया करता है ! माध्यम वर्गीय जनता क्या करे बेचारी..? अपनी कथित इज्ज़त की चादर सम्हालते-सम्हालते परिवार करीब-करीब भूखों मरने की सी नौबत तक आ चुकता है.. और इतने पर भी बेचारा परिवार अपनी इज्ज़त और झूठे संस्कारों का बोझ ढोते दिखाई पड़ता है..!!

सरकार को सभी मदों से सब्सिडी का खत्म तो ज़रूर करना चाहिए लेकिन इन इज्ज़तदार और नज़र नहीं आने वाले गरीबों की व्यथा को कौन समझेगा..? जिनकी आमदनी जस की तस पड़ी है और महंगाई सुरसा के मुँह सम बढती ही जाती है ! अपनी जीत का सपना पूरा करने के निमित्त लिए नेताओं को सब्सिडी का खेल दिखाई तो देता है पर वे यह भूल जाते हैं कि इससे कोई देश लम्बे समय तक सुचारू रूप से चल नहीं सकता ! ज़रूरत है इस समस्या के उचित हल निकले जाने की ! वर्ना निकट भविष्य में हमें नए बेबस और मजबूर गरीबों की एक नयी कतार बनी नज़र आने वाली है ! सरकार से आज के गरीब ही नहीं सम्हलते, गरीबों की एक नयी ज़मात कहाँ तक सम्हलेगी उससे..?

आरिफ़ अख़्तर काकवी.
काको , जहानाबाद , बिहार,
Comment by Serajuddin Khan on June 30, 2010 at 4:50am
This is protective communalism, we should not encourage people like JD (U) MP Ali Anwar Ansari let him to organise Sammelan or Mela or Mahutsav in the name of community. Nitish Ji should keep himself away from these pitty politics just for sake of vote, one side you are talking about social change and one side you are going to be a chief guest in Pasmanda Sammelan to be held on 1st July,it doesn't suit you. Please keep yourself away from these kind of Sammelan.
Comment by sushil kumar singhal on June 22, 2010 at 7:16pm
at present i am the active member of kpcc and online join nsui,global media club of india, indian youth congress in every state but i have not got work and status go for work on india level to interduce young person in indian politics in all india level but require support of seniors wait for support.
sushil singhal
c/o ...
Comment by udayveer on June 22, 2010 at 1:01pm
suna hai rajniti men koe dost nahin to dusman kahan raha aur nity ke raj ko hi rajniti kaha gaya hain lein niti ti nisji me pahle se hi hai ghabrane ke bat nahin ARFji aap ki samiksha to achi hai padne ke bad sthiti badi chintaniye sthiti hai Aap ne adyaan acha kiya hai it is all about power fight and the question of chair DEMOCRACY where is democracy we must educate people first then talk of democracy kathni our karni ka fark hai sara vicar kijiye aap ke sawalon me he jawab chupe huae hain
Comment by ARIF AKHTAR on June 22, 2010 at 11:58am
बिहार - राजनीति की नयी बिसात...!!!
बिहार का राजनीतिक तापमान चुनावी वर्ष में ऊपर चढ़ने लगा है.पिछले कुछ दिनों में बिहार में राजनीतिक समीकरण बदलने लगे हैं. नरेन्द्र मोदी के साथ के अपने तस्वीर को लेकर नीतीश आग बबूला हो उठे और गुजरात से कोसी बाढ़ पीड़ितों के मदद में मिले पैसे वापस करने की बात कह दी. शुरू में लगा की नीतीश ने अल्पसंख्यकों के नाराज होने के भय से ऐसा आवेश में कह दिया है. लेकिन जब भाजपा के समर्थन से चलने वाली सरकार ने भाजपा शासित राज्य के पैसे लौटाए तो, समझ में आया की मोदी तो बहाना कहीं और हीं निशाना है. नीतीश कुमार ने गुजरात सरकार को कोसी बाढ़ पीड़ितों के लिए दिए गए पैसे लौटा कर ठंढी हो रखी आग को हवा देने का काम किया है. हमेशा चुप रहने वाले बिहार के उप- मुख्यमंत्री सुशिल मोदी भी अब बाहें चढ़ा कर तैयार हैं.
राजनीति शतरंज के खेल की तरह होता है, यह पुरानी कहावत है. लेकिन मैं मानता हूँ कि राजनीति शतरंज के खेल से कहीं बहुत आगे होता है. शतरंज के खेल में सभी प्यादों की ताकत निश्चित होती है जबकि राजनीति में कब कौन ताकतवर हो जाये, कोई नहीं जानता. और सबसे बड़ी बात - शतरंज में खिलाडी कौन है और प्यादा कौन - यह सबको पता होता है. लेकिन राजनीति कब कौन प्यादा खिलाडी बन जाए यह भी पता नहीं चलता.
महत्वाकांक्षाओं का कोई अंत नहीं होता. नीतीश को सत्ता में हिस्सेदारी पसंद नहीं है और वे भाजपा से मुक्ति चाहते है. लेकिन बिहार में लालू यादव के कुशासन से संघर्ष के दिनों में भाजपा के योगदान के कारण वे ऐसा सीधे सीधे नहीं कर सकते थे और इसके लिए उन्हें कुछ कारण चाहिए था . अब इस बात के लिए भला नरेन्द्र मोदी से अच्छा बहाना और क्या हो सकता था. वरन गोधरा कांड के समय केंद्रीय मंत्री होते हुए भी नीतीश कुमार ने गुजरात सरकार पर क्योंकर कुछ नहीं बोला. 2009 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के बिहार प्रवेश पर एक तरह से पाबन्दी लगा चुके नीतीश कैसे बिहार में चुनाव समाप्त होते हीं उनके साथ लुधियाना में हाथ मिलाकर एकता प्रदर्शित करते हैं. मोदी ने तो गुजरात में आये भूकंप के समय बिहार द्वारा दी गयी मदद के लिए भी आभार व्यक्त किया था. उनकी भाषा ऐसी तो बिलकुल नहीं थी कि उससे बिहार का अपमान होता हो. दरअसल बिहार के 243 विधानसभा सीटों में से 103 पर भाजपा चुनाव लडती है, मात्र 140 सीटों पर चुनाव लड़कर जनता दल (यू) इतनी सीटें तो नहीं हीं जीत सकती की नीतीश को एकछत्र राज मिल सके. इसीलिए शायद वे जानबूझकर ऐसे हालात पैदा कर देना चाहते हैं की गठजोड़ खुद हीं टूट जाये और उन्हें वास्तविक राजा बनाने का मौका मिले. उन्हें लगता होगा की वे अगर नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा से गठजोड़ तोड़ेंगे तो अल्पसंख्यक मतों पर उनकी पकड़ बनेगी और उन्हें चुनावी वैतरणी पार करने में मदद मिलेगी. बिहार में अल्पसंख्यक वोट 17 प्रतिशत है और यह किसी के मुह में पानी भर देने के लिए काफी है. जानने वाले नीतीश को लालू यादव का चाणक्य बताते हैं. 1994 में बिहार में तब की जनता दल ने चालीस जातीय रैली आयोजित थी, नीतीश तब प्रत्येक रैली के संयोजक हुआ करते थे. अंतिम जातीय रैली कुर्मी जाति की थी. गौरतलब है कि नीतीश भी कुर्मी जाती से हीं आते हैं. कुर्मी रैली के बाद उन्होंने लालू यादव से कुर्मियों के लिए आरक्षण कि मांग कि और स्वीकार न होने पर पार्टी से त्यागपत्र दे कर जार्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में समता पार्टी का गठन किया. 1999 के लोकसभा चुनाव के समय जनता दल टूटी और उसका अस्तित्व हीं समाप्त हो गया और दो नए दल जनता दल (सेक्युलर) तथा जनता दल (यूनाइटेड) का जन्म हुआ. हालात कुछ ऐसे बने कि रामविलास पासवान को जनता दल (यूनाइटेड) से नाता तोड़ अलग दल का गठन करना पड़ा और नीतीश पार्टी समेत जनता दल (यू) में शामिल हो गए. नीतीश ने पिछले 15 वर्षों में काम निकाल कर हर किसी को ठेंगा दिखाया है. जार्ज को साइड करने के लिए नीतीश ने शरद यादव को समर्थन दिया. अब जबकि जार्ज इतिहास बन चुके हैं तो उन्होंने शरद यादव को रबर स्टाम्प अध्यक्ष बना दिया. लालू यादव के पिछरों और दलितों के गठजोड़ से लड़ने के लिए प्रभुनाथ सिंह, दिग्विजय सिंह और लल्लन सिंह जैसे सवर्ण नेताओं का इस्तेमाल किया और जैसे हीं लालू कि ताकत घटी तो इन सबको इनकी औकात बता दी. अब क्या आश्चर्य कि नीतीश भाजपा को भी ठेंगा दिखा दें?
नीतीश ने अपनी तैयारी लोकसभा चुनाव के समय से हीं शुरू कर दी थी, पहली कारर्वाई के तौर पर दिग्विजय सिंह और जार्ज फर्नांडिस का टिकट कटा. दूसरी प्रभुनाथ सिंह और लल्लन सिंह को टिकट देकर हराने की पुरजोड़ कोशिश कि गयी. लल्लन सिंह तो जीत गए लेकिन प्रभुनाथ सिंह हार गए.किसी जमाने में कर्पूरी ठाकुर के शिष्य रह चुके नीतीश ने जमीन सुधार के लिए बंदोपाध्याय कमिटी का गठन किया. वे बिहार में पिछरों का मसीहा बन कर एकक्षत्र राज पाना चाहते थे. लेकिन लोकसभा चुनाव के ठीक बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में नीतीश को जोरदार झटका लगा और वे थोरा सावधान हुए भी. नहीं तो हम कब का भाजपा जनता दल (यू) का तलाक देख चुके होते. हलाकि आगे का सफ़र नीतीश के लिए कांटो भरा है. वे यदि सफल होते हैं तो इतिहास बना देंगे, लेकिन यदि असफल हुए तो उन्हें स्वयं हीं इतिहास बन जाना होगा.
यदि सचमुच बिहार में जनता दल (यू) और भाजपा की राहें अलग होती है तो बिहार के विधनासभा चुनाव का रोमांच चरम पर होगा. भाजपा, जनता दल (यू), कांग्रेस और राजद - लोजपा के मध्य बहुकोनिये मुकाबला (multi-corner contest) होगा, जिसमे नतीजे कुछ भी हो सकते हैं.
यदि नीतीश अपनी योजना के अनुसार ओड़िसा के मुख्यमंत्री नविन पटनायक को दुहरा सके तो वे बिहार की राजनीति में वह स्थान प्राप्त कर लेंगे जो कभी लालू यादव का हुआ करता था. उनका पूरा खेल इस बात पर टिका होगा की वे पिछरों के मत को एक साथ रख सकें और यादव मतों नहीं तो सवर्ण और अल्पसंख्यक मतों में अच्छी खासी हिस्सेदारी कर सकें. यदि नीतीश अकले बहुमत में नहीं आ सके तो लालू यादव के 'कुशासन' से बिहार को बचाने के लिए भाजपा की से फिर हाथ मिला सकते हैं. लेकिन ऐसे में नीतीश वह रुतबा फिर कभी हासिल नहीं कर सकेंगे. और फिर भाजपा से वापस हाथ मिलाना इस बात पर भी तो निर्भर करेगा की चुनाव में दोनों दलों के मध्य किस स्टार तक छिटाकशी और तल्खी बढती है. चुनाव के बाद उनके पास कांग्रेस के भी साथ जाने का विकल्प होगा, लेकिन यह इतना आसन भी नहीं है. शरद यादव और उनके जैसे कई नेताओं की पूरी राजनीति कांग्रेस विरोध पर हीं टिकी रही है, ऐसे में अगर नीतीश कांग्रेस के साथ गए तो शरद यादव की हालत वि.पी. सिंह वाली हो जाएगी और उन्हें असमय राजनीति से विदा होना पड़ेगा. अब यदि ऐसे हालात बनते हैं की नीतीश किसी भी तरह सत्ता में न लौट सके तो वे बिहार में रामसुंदर दास को दुहारायेंगे और कोई उनका नामलेवा नहीं बचेगा. लेकिन नीतीश इस खतरे के लिए तैयार दीखते हैं.
अब बात करते हैं भाजपा की. भाजपा का बिहार में अपना एक पारंपरिक वोट बैंक तो है हीं. साथ हीं वह सवर्ण और और आर्थिक रूप से सम्पन्न कुछ पिछरी जातियों में भी अच्छी पकड़ रखती है. सी. पी. ठाकुर भूमिहारों में, राजीव प्रताप रूढी राजपूतों में, अश्विनी चौबे ब्राह्मणों में, सुशील मोदी बनिया तथा कुछ अन्य पिछड़ी जातियों में, रवि शंकर प्रसाद कायस्थ समाज में अच्छी पकड़ रखते हैं. दुसरे यदि पार्टी किसान विकास मंच से जुड़े नेताओं को जो नीतीश से बेहद नाराज चल रहे हैं, अपने साथ जोड़ पाने में कामयाब हुई और नीतीश को अच्छे से एक्सपोज कर सकी तो भाजपा के लिए भी बिहार में सम्भावनाये हैं. अगर भाजपा नीतीश को हराकर खुद हार भी जाती है तो भी उसे एक सुकून हासिल होगा.
कांग्रेस आज से एक वर्ष पहले बिहार में कहीं नहीं थी. लेकिन राजनीति का समय चक्र घुमा और पार्टी ने लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया. उसके बाद हुए उपचुनाव में तो पार्टी ने ताल ठोक कर साबित कर दिया की बिहार में कांग्रेस लड़ाई में तो लौट हीं चुकी है. लेकिन पार्टी अपने कमजोर संगठन और विपक्ष की बजाये अपनों से हीं ज्यादा लड़ने वाले नेताओं के कारण अपने हीं पैरो पर कुल्हारी मारती रही है. प्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन पार्टी के लिए एक अच्छा संकेत है. इस बार आलाकमान भी बिहार को लेकर अधिक गंभीर दिख रही है.चुनावी खेल के माहीर नेताओं को बिहार में अभी से लगा दिया गया है. पार्टी को अल्पसंख्यक वोट से बहुत ज्यादा उम्मीद है, तभी चौधरी महबूब अली कैसर को पार्टी ने बिहार का नेतृत्व दिया है. कैसर एक जाने माने राजनीतिक परिवार से आते हैं और अपनी साफ़ सुथरी छवि के लिए जाने जाते हैं. जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह ये की राहुल गाँधी को लेकर बिहार में बेहद आकर्षण है. पार्टी अगर अल्पसंख्यक मतों के साथ सवर्ण मतों और दलित मतों में अच्छी हिस्सेदारी कर सकी और राहुल गाँधी का जादू चला तो, उत्तर प्रदेश से पहले कांग्रेस बिहार पर कब्ज़ा कर लेगी. पार्टी को राजग के टूटने का फायदा भी मिलेगा और वे सरकार की विफलता को सीधे नीतीश के साथ जोड़ सकेंगे.
आखिर में लालू और पासवान! लालू यादव और रामविलास पासवान के लिए यह चुनाव अपने अस्तित्व को बचाने की कायावाद होगी. अल्पसंख्यक मतों से लालू यादव का एकाधिकार समाप्त हो चूका है. दलितों में महादलित बनाकर नीतीश ने पासवान की नकेल कस दी है. यादव मतों में भी पप्पू यादव और शरद यादव की हिस्सेदारी हो गयी है. जबकि अन्य पिछड़ों के लिए नीतीश हीं पहली पसंद हैं. सवर्णों की लालू यादव से एलर्जी, जो कभी पिछड़ों और दलितों के गोलबंद करने के लिए उनकी ताकत हुआ कराती थी, आज वही सबसे बड़ी कमजोरी बन गयी है. लालू यादव का संगठन बिखर चूका है और मंडल मसीहा का तमगा भी नहीं रहा ऐसे में कोई चमत्कार हीं उन्हें में सत्ता दिला सकती है. हलाकि लालू यादव चमत्कारों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन ये चमत्कार तो बहुत हीं मुश्किल है. वैसे अभी भी लालू यादव का एक वफादार वोट बैंक उनके पास है लेकिन यह इतना तो नहीं की उन्हें सत्ता में वापस ला दे. हाँ राजग टूटने से जो समीकरण बनेंगे उसमे उनका वोट बैंक फिर से महत्वपूर्ण हो जायेगा क्योंकि भाजपा के अलग लड़ने से लालू विरोधी मत भाजपा, कांग्रेस और जनता दल (यू) में बटेंगे. ऐसे में लालू और पासवान यदि 5 प्रतिशत अतिरिक्त मत भी जुगाड़ लें तो वे बहुत कुछ अपने हिसाब से बदल देंगे.
कुलमिलाकर बिहार का ये चुनाव देश की राजनीति पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है. यदि नीतीश भाजपा से भी अलग होकर जीत गए तो वे भविष्य में बनाने वाले किसी भी तीसरे मोर्चे का स्वाभाविक नेता हो सकते हैं. दुसरे यदि बिहार में राजग टूटता है तो असल में यह कांग्रेस विरोधी राष्ट्रव्यापी गठजोड़ की आधिकारिक मृत्यु होगी और भाजपा को आगे का सफ़र अकले हीं करना होगा. बिहार का यह विधानसभा चुनाव असीमित मत्वाकंक्षाओं का, संभावनाओं को हकीकत में बदलने के प्रयासों का और खोई हुई ताकत को वापस पाने की अंतिम कोशिशों का चुनाव होगा, जो कि आने वाले दशकों में न केवल बिहार बल्कि पूरे देश कि दशा और दिशा पर एक अमिट छाप छोड़ जायेगा.

आरिफ अख्तर काकवी,
काको, जेहानाबाद, बिहार.
 

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Started by Abdur Rab Dec 11, 2013. 0 Replies

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Started by Yogesh Dwivedi Jul 9, 2012. 0 Replies

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Started by upendra sah. Last reply by Gaurav Gupta Jun 21, 2012. 1 Reply

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Started by upendra sah. Last reply by RAJKUMAR SINGH Jun 28, 2013. 34 Replies

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